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संदेश

अधूरी मुलाकात

  अभी कुछ दूर चला था मैं अभी कुछ दूर जाना है, हमें कहीं और जाना है हमें कहीं और जाना है, मिले थे रास्ते में वो सोचा कुछ बात कर लु, दूरियां दिल में ना रहे मुलाकात कर लु, अभी कुछ दूर चला था मैं अभी कुछ दूर जाना है,.... (लेखक रामू कुमार)

Mi life style

 हर घर में बस एक दुकान' माई लाइफ का अपना शान'     हर घर में समझाना है'      माई लाइफ अपनाना है दवा से लेकर खाद बीरो तक' सब यहीं मिल जाना है' सुंदर स्वास्थ्य रोग मुक्त' अब भारत को बनाना है'     देश के हर कोने कोने में'      यह संदेश पहुंचाना है'      माई लाइफ है सबसे उत्तम'      इनका सामान अपनाना है' मिलजुल कर सब काम करेंगे' माई लाइफ में नाम करेंगे' सुंदर सोच बनाना है' हर घर में बस एक दुकान' माई लाइफ अपनाना है'      हर सप्ताह में मेहनत का फल'      बगैर मांगे पाना है'      इन पैसों से अपने घर मे'      अमन शांति लाना है'

यादें

 होकर दूर हम तुमसे तुम्हारा फिक्र करते हैं भरी मेहफिल मे जाकरके तुम्हारा जिक्र करते हैं अपनी हर गजल और गीत में तुम्हें गुनगुनाता हूं तुम से हर जुड़ी वो  चीज अब पवित्र लगते हैं                  होकर दूर हम तुमसे तुम्हारा फिक्र करते हैं.. खुद को आईने में जब भी देखता हूं कभी उस आईने में भी तुम्हारा चित्र रहते हैं                  होकर दूर हम तुमसे तुम्हारा फिक्र करते हैं.. तुम्हारी हर पुरानी खत को मैं रोज पढ़ता हूं उन खत में तेरी हाथों का इत्र रहते हैं                  होकर दूर हम तुमसे तुम्हारा फिक्र करते हैं.. जब तन्हाई की जंजीर मेरे ओर बढ़ता है तेरा नाम लेकर हम वहां बेफिक्र रहते हैं                  होकर दूर हम तुमसे तुम्हारा फिक्र करते हैं.. Writer Ramu kumar

अकेलापन

दीया अकेला जल रहा,कमरा खाली खाली है! खिड़की के पल्ले झुल रहे,जैसे वो पेड़ के डाली है! मधुशाला में मधु छिड़कने  वाला देखो जाली है!! बोतल का ढक्कन लगा हुआ पर सारा बोतल खाली है!            दीया अकेला जल रहा.... फूल सींचने वाला माली कर्म हीन अनारी है! गुलशन का तो पता नहीं बस काटो का फुलवारी है! अंबर से समंदर तक राते काली-काली है! पंछी का तो पता नहीं बने भौतिक हरियाली है!              दीया अकेला जल रहा.... चेतना अधीर हुए अब झूठा प्रेम पुजारी है! सत्य अहिंसा  फीका पड़ा झूठ का पलड़ा भारी है! दीया अकेला जल रहा कमरा खाली खाली है! खिड़की के पल्ले झूल रहे जैसे वो पेड़ के डाली है! Writer Ramu kumar

तन्हा सफर

हुजूर यहां अब गुजारा नहीं,                          आशियाने में चांद सितारा नहीं,                              सूरज भी अकेला जलता रहा                                उनका भी तो कोई सहारा नहीं,                                                               हुजूर यहां अब गुजारा नहीं.. देखे हैं जो ख्वाबें हमने सदा                                  वैसा यहां कुछ ना नजारा नहीं,                                हर दिल अकेला मचलता रहा      ...

बदलते जमाना

देख जमाना बदल रहा है! उड़ते पंछी संभल रहा है! भौतिक रंग चढ़ गए सब पर प्रकृति की भी मचल रहा है!                   देख जमाना बदल रहा है! नदी सिमटकर नाला बन गई! नरम रुई अब भाला बन गई! नए रोग अब पनप रहा है देख जमाना बदल रहा है!                   देख जमाना बदल रहा है! संस्कृति भी हुई बेहोश! पड़ा जो उनपे भौतिक ओश! पुरानी चीजें कलप रहा है! देख जमाना बदल रहा है!                  देख जमाना बदल रहा है! उथल-पुथल है जीवन सबका! अमन चैन लुट गए हैं कब का! साधु संत भी सनक रहा है! देख जमाना बदल रहा है!                 देख जमाना बदल रहा है गुलशन में सुगंध कहां है! प्रकृति में आनंद कहां है! सत्य अहिंसा दबक रहा है देख जमाना बदल रहा है!             देख जमाना बदल रहा है..देख जमाना बदल रहा है!         ( लेखक रामू कुमार)

1st love

पीके इश्के खुराख जवां हो गए! नर्म विस्तर को छोड़ कहां सो गए! गम का दरिया भी धीरे से सूख गया! यैसा लगता जैसे जहां हो गए! Writer Ramu kumar)

चलो हुजूर चलते हैं

बदलते मानव

  चिंता की चिता सजा करके! अंदर ही अंदर जलते हो!! औरों की खुशी में जहर मिलाकर ! सोने का कफन पहनते हो !!          मुस्कान भरे चेहरे को लेकर!           हाट बाजार टहलते हो!!            निर्धन काया से भी अक्सर!            उल्टी बाजी चलते हो!!                           औरों के खुशी मे....२ भोजन में जहर मिला करके! इधर उधर से ठगते हो!! कहते हो इसमें अच्छा गुण है! कह कर इतना चलते हो!!                        औरों के खुशी में....२ माथे पे तिलक लगाकर के! मुख से जहर उगलते हो!! तामसी भोजन रातों में! सुबह हाथ चंदन से मलते हो!!                       औरों के खुशी में....२ कहते हो निश्चल मानव हूं! औरों के खुशी से जलते हो!! गीता पे हाथ रख कर के! पैसों से बात बदलते हो!!             ...

मूल मंत्र

  सफेद समंदर मन के अंदर !   नाचत नाचत ढेर भयो !  निश्छल मानव इस कलियुग में ढूंढत ढूंढत देर भयो !!  समतल मन में चंचल कोकिल !  चित्कार गड़लता सोर कियो  हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई !  मानवता सब छोड़ दियो !  वेद पुराण भूले सब पंडित !  मुद्रा से धर्म तोल लियो !  रणनीति सी वेद सुना कर !  कटुक वचन का मोल लियो   मानव धर्म प्रथम में लेकर! दुजे धर्म प्रभु तेरो  जग की मायाा झूठन लागे ! अंत समय कछु घेरो   - रामू कुमार                                                   !!!लेखक रामू कुमार!!!