मेरे भोले दानी बाबा, पहिरेले मृगछाला, भूत बैताल को वह, संघ मे नचाते हैं! विषधर पेन्हें माला, तीन नैन वाले बाबा, डमरू के तान पर, बसहा बुलाते हैं! पूजते हैं नर नारी, कहके जट्टा के धारी, जट्टा मेसे अपने वो, गंगा जी बहाते हैं! भांग धतुरा अछत् , संगही में बेलपत्र, मिलके भगत जन, उनको चढ़ाते हैं! ( लेखक रामू कुमार)
मैं अपनी विचारधारा, उन तमाम लोगों तक पहुंचाना चाहता हूँ । जो हमें एक नई दिशा की ओर अग्रसर करें। मैं अपनी कविता कहानी संवाद इत्यादि के माध्यम से , एक यैसा मंजील हासिल करना चाहता हूं जहां पहुंचकर हमें, अत्यंत हर्ष प्रतीत हो।