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कड़ाके की ठंड- हिंदी कविता


चांद तारे सब ठिढूर रहे हैं,
पेड़ पे पंछी विटूर रहे हैं।
*
खेतों की रखवाली करते हैं झींगुर,
झीपी झीपी राग है मंजूर।
*
बगुले कोयल बन कर बैठे,
बाग में खाली ठंडी जैसे।
 *
आवन पावन धीमी चिराग,
आहें भरते नई फिराग।
*
ओस की बुंदे बनी है सीत,
उनसे बिछड़े उनके मीत।
*
बाट बटोही थक गए चल कर,
गरम करे खुद हाथ को मल कर।
*
चली पवन जब सिसकी  लेकर,
दूर हुई गर्मी ठंडी देकर।
*
मकड़ी जाल में फंसी है ओस,
देखकर मकड़ी हुई बेहोश।
*
घड़ी भी टिक टिक शोर मचाए,
दौड़ने को वह दिल ललचाए।
*
आग भी सो गई जोश दिखा कर,
सोए हैं सब मुंह छिपाकर।
*
अत्यंत दुखदाई है यह ठंडी,
हुए हैं कपड़े गंदी गंदी।
       
     ।।।लेखक रामू कुमार।।।

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